
भाइयों-बहनों, माई इंडिया ऑफ़ आइडिया
नहीं, कतई ग़लती से नहीं लिखा है यह शीर्षक. यही सुनाई दिया था पिछले दिनों दिल्ली के रामलीला मैदान से जहाँ मोदी भाजपा की राष्ट्रीय परिषद के 10 हज़ार सदस्यों को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने अपने संबोधन में

नहीं, कतई ग़लती से नहीं लिखा है यह शीर्षक. यही सुनाई दिया था पिछले दिनों दिल्ली के रामलीला मैदान से जहाँ मोदी भाजपा की राष्ट्रीय परिषद के 10 हज़ार सदस्यों को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने अपने संबोधन में

बेटा नरेंद्र, आज तुम एक सूबे के मुख्यमंत्री हो. अपनी हठधर्मिता से एक पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी बन गए हो. तुम हेलीकॉप्टर में धूमते हो, ब्रांडेड कपड़े पहनते हो, काले चश्मे लगाते हो, अंग्रेज़ी में हाथ आजमा लेते हो, चप्पलों तक

(1) मंदाकिनी के तट पर बिखरे हाथों में चिपटा है काला ख़ून मिट्टी अब चमड़ी का रंग है गरजती धारा गुस्से से झाग उगल रही है समय की गति से कटते पत्थर जीवन से भी तेज़ गति से समा रहे

स्क्रिप्ट यों शुरू होती है…. गुजरात के मेहसाणा का बड़नगर. यहां एक लबालब भरा तालाब. इस तालाब के बीच एक मंदिर. मंदिर पानी में जलमग्न. उसका शिखर पानी से बाहर. शिखर पर पुराना झंडा. इस झंडे को बदलना था

शौक की ही तो बात है. वरना कोई सोने के पालनों में पला बच्चा आखिर किसलिए ऐसा करता. तुम्हारी औकात क्या है बे साले. गांड़ धोने को पानी तक आता नहीं तुम्हारी बस्तियों में. बास मारती कमीज़ें पहनकर ब्रायलर मुर्गों

मेरा एक गाना दिल खोल कर गाने का मन कर रहा है. अल्लाह, अल्लाह, मैं हुई जवान. अल्लाह अल्लाह, तू है कहां. याद आया आप लोगों को ये गाना. अमां हमारे लौंडपने का बड़ा गर्माहट भरा गाना था. उन दिनों सलमान का चेहरा

तो जनाब, आज की मुमकिन बातचीत में कई दिनों की चुप्पी की बाद आपसे मुख़ातिब हूं. बातचीत का मुद्दा इतना पुराना नहीं है. सूर्य दक्षिणायण की कथा है, उत्तरायण में ध्यानार्थ प्रेषित है. कथा कुछ इस तरह है कि संजय

तो चलिए जनाब, आज आपकी मुलाक़ात करा देते हैं एक ऐसे शख़्स से जो शायद आज की मुकम्मल तारीख में भारत के सबसे दुखी इंसान हैं. न, ऐसा नहीं है कि ये अपनी पत्नी से परेशान हैं और न ही

पिछले दिनों दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में किंडल पत्रिका की ओर से आयोजित एक संगोष्ठी में जाने का मौका मिला. विषय था- डायलेक्टिक्स ऑफ़ लॉस. संवाद के लिए कलाकार और बहुआयामी व्यक्तित्व वाले सारनाथ दा हमारे बीच थे. हानियों,

मैं टोपी हूं. शिरोधार्य. यही तो कहा गया था मुझे आकार देते हुए. बाद में मैंने पाया कि मैं दरअसल पुरुषों का गंजापन छिपाने का एक तरीका हूं. आमतौर पर जिनके सिर पर मुझे जमा हुआ दिखाया जाता है, अंदर